फील्ड विज़िट के अनुभव

Written By: Sarthak Foundation

सार्थक फाउंडेशन में आजकल लखनऊ में Yellow Rooms शुरू करने के लिए स्लम सर्वे चल रहे हैं। रोज़ अलग अलग टीमें लखनऊ के अलग अलग हिस्सों में ऐसे समुदायों को ढूंढने जाती हैं जहाँ के बच्चों को शिक्षा और सोशल-इमोशनल लर्निंग (SEL) से जुडी सहायता की ज़रुरत है।

आज मैं और मेरे चार सहकर्मी हमारे ऑफिस से तक़रीबन पच्चीस किलोमीटर दूर एक गाँव/बस्ती को देखने और उसका सर्वे करने गए थे। गाँव के बीच में एक छोटा तालाब है जिसमें सारे घरों का कचरा और गन्दा पानी जाता है। लेकिन दिखने में वो तालाब थोड़ा सुन्दर है। कुछ बतख के बच्चे, या शायद छोटे अकार की बतख की किसी प्रजाति की बतखें, उसमे यहाँ-वहां बेफिक्र घूम रही थीं। ठंडियाँ आ ही गयी हैं और स्कूल उन्हें जाना नहीं इसलिए वो झुण्ड बना कर पानी में आवारागर्दी का काम कर रहीं थीं। मद्धम धुप के मज़े लेतीं बतखों को देख कर मुझमें भी अंदरूनी संतुष्टि की चाह सी उठी, इसलिए वहां बैठ कर गप्पें मारतीं कुछ वृद्ध महिलाओं से मैंने पूछ लिया – “अम्मा इस तलइया में मछलियां हैं क्या?”

उस गैंग की एक अम्मा ने जवाब दिया – “अभी बस छोटी छोटी सी डाली हैं, लेकिन अभी वो बड़ी नहीं हुई हैं”।

मुझे लगा शायद इसी वजह से बतखें लम्बाई में छोटी रह गई हैं।

ख़ैर हम लोग आगे बढे। रास्ते में मिट्टी के घरों पे लदी बेलें देख कर मेरी सहकर्मी ने मुझे बताया “ये लौकी है, क्यूंकि इसके फूल सफ़ेद हैं। अगर फूल पीले होते तो ये कद्दू की बेल होती।”

आगे पीले फूल वाली बेल देख कर मैं अनायास पूछ उठा – “कद्दू?”

वो बोली – “नहीं, तोरई।”

उसने इसके आगे बताया नहीं और मैंने पूछा नहीं। कद्दू हो या तोरई, जिस गली जाना नहीं उसके रास्ते को धोने पोछने का क्या फायदा?

एक ऐतिहासिक से दिखते, घांस की कम्बल से आवृत टूटे-फूटे पुराने घर के पास से गुज़रते समय मैंने देखा की अंदर चार-पाँच पुरुष ताश खेलने में व्यस्त थे। वैसे तो हाथ में कॉपी किताब लिए, सीने पे पीली नाम-पट्टियां लगाए हम लोगों को सामने पा कर गांव का हर व्यक्ति हमें कौतुहल भरी निगाहों से देखता था, मगर मजाल है जो ताश के एक भी कसरती ने हमारी तरफ आँख उठा कर भी देखा हो। जब येलो रूम्स खुलेंगे तो बच्चों को ध्यान लगाने की शिक्षा देने इन्हे ही बुलाएंगे।

हम लोगों को लगा की आए हैं तो अपने येलो रूम्स शुरू करने के लिए किराये के कमरे भी क्यों ना ढूंढ लिए जाएँ। पूछते पूछते एक घर मिला जो बिलकुल हमारे काम के लिए उपयुक्त था – दो कमरे थे, बाथरूम था और कोई दूसरा  किराएदार भी नहीं था जिसे बच्चों की आवाज़ों से परेशानी हो। हम लोगों ने मकान मालिक को बताया की बच्चे आएँगे रोज़, थोड़ा शोरग़ुल भी होगा, और बच्चे गाँव के सभी टोलों से आएँगे। उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी, जिसे सुन कर हम लोग खुश हुए। मकान मालिक की खुद का एक दो साल का बच्चा था जिसे “ना भूलने” की बीमारी थी। उन्होंने बताया की दो-तीन दिन पहले बताई गई बातें भी उनका बच्चा याद रखता है। उन्होंने बच्चे का नाम भी बताया पर वो हम में से किसी को अभी याद नहीं।

एक गली में एक ट्रैक्टर-नुमा गाड़ी पे एक छोटे कमरे के अकार की मशीन डुग-डुग कर रही थी। मेरी जानकर सहकर्मी ने बताया – “ये पोर्टेबल चक्की है और घर घर जा कर धान की छंटाई कर रही है।”

मुझे इस तरह से सेवाओं की होम डिलीवरी देख कर और चक्की की आवाज़ सुन कर आनंद की अनुभूति हुई।

मेरी सहकर्मी ने मुझे बताया – “इस मशीन से धान अलग और उसकी भूसी अलग हो जाती है। बज्जर गावों में तो धान की भूसी को गद्दों में भी भर लेते हैं।”

‘बज्जर’ शब्द मैंने पहली बार ही सुना था। इसलिए मुझे फिर से आनंद की अनुभूति हुई।

मैंने इधर उधर देखा और अपने सहकर्मियों से कहा – “आप ने नोटिस किया, यहाँ कोई भी अपने फ़ोन पे व्यस्त नहीं है?” मेरे सहकर्मियों ने भी इधर उधर देख कर हाँ में सर हिलाया। वाकई गाँव का एक भी व्यक्ति सर झुकाये, अपनी स्क्रीन को ताकते नहीं बैठा था। सब या तो एक दूसरे से गपिया रहे थे, या कुछ काम कर रहे थे, या शुन्य में टकटकी लगाए गूढ़ चिंतन में व्यस्त थे।

मैंने कहा – “ये होते हैं संस्कार। पूरा गाँव फ़ोन के दुष्प्रभाव से बचा हुआ है। मानो सबने तय किया हो कि सोशल मीडिया  और Instagram जैसी व्यर्थ चीज़ों में कोई भी समय नहीं बर्बाद करेगा, भले ही कहीं बैठ के जुआ क्यों न खेलना पड़े।”

मेरे एक युवा सहकर्मी ने कहा – “गाँव के गली टोलों की महिलाऐं भी रोज़ शाम को इकठ्ठा होती हैं।”

मैंने पूछा – “जुआ खेलने?”

वो सकपका के बोला – “अरे नहीं नहीं। बस बैठ के बातचीत करने।”

उसकी सकपकाहट से मुझे लगा कि अभी ऑफिस के युवा सहकर्मियों को gender पे थोड़ी और ट्रेनिंग की आवश्यकता है।

हम लोग सर्वे कर के वापस आ गए। अब भरे गए फॉर्म्स और इकठ्ठा किये डाटा के आधार पे निर्णय किया जाएगा की ये गाँव येलो रूम्स खोलने के लिए मुनासिब है या नहीं। ज़रुरत तो बड़ी है। अभिभावक चाहते भी है की उनके बच्चे पढ़ें और आगे बढ़ें। लेकिन कहीं भी येलो रूम्स खोलना तभी viable होता है जब एक निश्चित संख्या के बच्चे उस समुदाय में हों। जो शायद यहाँ नहीं हैं। हमें पता है कि हर किसी की मदद नहीं की जा सकती है, लेकिन फिर भी अच्छा तो नहीं लगेगा। किसी के रोज़ाना जीवन के कुछ पल साझा करने से एक धागा सा बंध जाता है। ये अनायास लगाव सा जो हो जाता है, शायद यही हमें मनुष्य बनाता है।

– अचिन्त्य

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